कर्मचारियों के आगे नतमस्तक हुई सरकार!

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देहरादून ; सुबह की पूर्ण बहुमत की सरकार कर्मचारियों के आगे नतमस्तक दिखाई दे रही है जिस तरह से बुधवार को कैबिनेट ने 37 दिनों तक हड़ताल पर रहने वाले मिनिस्ट्रियल कार्मिकों के हड़ताल को ऊप्स अर्जित अवकाश में समायोजित करने पर मुहर लगा दी है उससे ऐसा लगता है कि सरकार कर्मचारियों के दबाव में कार्य कर रही है।
बुधवार को कैबिनेट बैठक के बाद शासकीय प्रवक्ता मदन कौशिक ने कैबिनेट बैठक के निर्णय को ब्रीफ करते हुए बताया कि महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग के तहत आईसीडीएस निदेशालय के मिनिस्ट्रीयल कार्मिकों की 37 दिन की हड़ताल अवधि को उपार्जित अवकाश में समायोजित किया जाएगा। दरअसल मिनिस्ट्रीयल कार्मिकों की ओर से पदोन्नति में स्टाफिंग पेटर्न लागू करने की मांग को लेकर 3 नवंबर 2016 से 9 दिसंबर 2016 तक 37 दिन की हड़ताल की थी। कार्मिकों के आंदोलन पर मिनिस्ट्रियल संवर्ग के ढांचे में स्वीकृत पदों के सापेक्ष स्टाफिंग पेटर्न की स्वीकृति प्रदान की गई, लेकिन कार्मिकों को हड़ताल अवधि का वेतन भुगतान नहीं किया गया था। मिनिस्ट्रियल कर्मचारी संगठन की ओर से बार-बार हड़ताल अवधि का वेतन भुगतान करने की मांग उठाई गई जिस पर महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से हड़ताल की अवधि को उपार्जित अवकाश में समायोजित करने के प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी।
तो वहीं कांग्रेस ने कहा कि कर्मचारियों को सातवें वेतन देने से अच्छा सरकार को अपने आर्थिक संसाधन बढ़ाने की और ध्यान देना चाहिए था। सरकार को पहले प्रदेश के विकास कार्यो पर धन आवंटित करना था उसके बाद ही सातवे वेतन का फैसला लेना चाहिए था ।
सरकार के फैसले के बाद कर्मचारियों में खुशी दिखाई दे रही है लेकिन नो वर्क नो पे के पैटर्न को बड़ा झटका लगता हुआ दिखाई दे रहा है वैसे भी उत्तराखंड के अंदर गाहे-बगाहे बेलगाम अफसरशाही और चुनावों के वक्त कर्मचारी संगठनों का सरकार के ऊपर दबाव साफ देखा जाता रहा है ऐसे में जिस तरह से सरकार ने हड़ताल अवधि को उपार्जित अवकाश में समायोजित किया है वह कहीं ना कहीं राज्य हित में नहीं दिखाई दे रहा है। बड़ा सवाल यही है कि जब पूर्ण बहुमत की सरकार दबाव में काम करेगी तो ऐसे में राज्य का भविष्य क्या होगा।

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