प्रकृति पर्व हरेला की धूम 16 जुलाई से, उत्तरांचल उत्थान परिषद मनाएगा 16 जुलाई से 15 अगस्त तक

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देहरादून। प्रकृति पर्व हरेला की धूम 16 जुलाई से प्रारंभ होने वाली है। प्रकृति पर्व हरेला यूं तो कुमाऊं का प्रमुख त्यौहार है, जिसमें हरियाली बोने का काम किया जाता है। यही काम शारदेय तथा वासन्तिक नवरात्रों में भी होता है। लेकिन कुमाऊं में इस प्रकृति पर्व को उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उससे जुड़े सामाजिक संगठन उत्तरांचल उत्थान परिषद द्वारा इस पर्व को मनाने की व्यापक तैयारियां की गई है। उत्तरांचल उत्थान परिषद 16 जुलाई से 15 अगस्त तक 30 हजार पौधों का रोपण करेगा तथा उनके संरक्षण की जिम्मेदारी क्षेत्रवासियों पर छोड़ेगा। हरेला कब से मनाया जा रहा है, इस बारे में शायद ही कोई जनता है पर उत्तरांचल उत्थान परिषद के अध्यक्ष प्रेम बड़ाकोटि का कहना है कि श्रावण संक्रांति जिसे कर्क संक्रांति कहा जाता है से यानि 16 जुलाई से हरियाली पर्व हरेला वृक्षारोण कार्यक्रम के रूप में मनाया जा रहा है जो सामाजिक पर्वत बन गया है। यह कार्य सांस्कृति, धार्मिक और सामाजिक तीनों प्रकार का है। अपनी स्थापना वर्ष 1988 से ही उत्तरांचल उत्थान परिषद असाढ़, सावन और भादों में व्यापक रूप से वृक्षारोपण अभियान चलाता है। उत्तरांचल उत्थान परिषद के अध्यक्ष वरिष्ठ समाजसेवी प्रेम बड़ाकोटी का मानना है कि गत वर्ष राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा हजारों की संख्या में वृक्षारोपण किया गया था जिसमें 15 हजार वृक्षारोपण किया गया। इस वर्ष यही संख्या 30 हजार अनुमानित है। 16 जुलाई को मसूरी बाईपास स्थित गढ़वाली कालोनी में वृक्षारोपण किया जाएगा। यही से कार्यक्रम की शुरूआत होगी।
उत्तरांचल उत्थान परिषद वृक्षारोपण के साथ ही साथ वृक्ष संरक्षण के लिए अपने कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोगों को वृक्ष गोद देता है ताकि वे उन वृक्षों के संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी पूरी तरह निभाएं। श्री बड़ाकोटी का कहना है कि संगठन द्वारा लगाए गए सभी वृक्ष पूरी तरह संरक्षित किए गए हैं। अपवाद स्वरूप कुछ वृक्षों को छोड़कर सभी 15 हजार वृक्ष अब तक जीवित है। उनका कहना है कि उत्तरांचल उत्थान परिषद के माध्यम से कई सामाजिक संकल्पों को भी पुनर्जीवित किया जा रहा है। पर्वतांचल में प्राय: हर घर में नालीदार चदरों के सामने वर्षा जल संरक्षण का एक विशाल कुंड बनाया जाता था जिसमें वर्षा जल संग्रहित होता था। इस जल से बर्तन और कपड़े धुलने तथा पशुओं को पिलाने के काम में लिया जाता था, पेयजल का प्रबंध अलग होता था। धीरे-धीरे यह परंपरा समाप्त हो चुकी है। इसे पुनर्जीवित करने के लिए उत्तरांचल उत्थान परिषद अपनी पत्रिका हिमांजलि के माध्यम से वर्षा जल संरक्षण के लिए पुन: प्रेरणा देगा ताकि पर्वतांचल में पानी संरक्षित करने का यह पुराना तरीका पुन: जीवित हो सके।

 

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